पहला घंटा ही तय करता है कि पैसा वापस आएगा या नहीं
साइबर धोखाधड़ी में वसूली लगभग पूरी तरह गति का सवाल है। खाते से निकलने के बाद पैसे के साथ असल में क्या होता है, और यह मौका घंटों में क्यों खत्म हो जाता है।
पैसा एक जगह नहीं रुकता
जिस खाते में आपका पैसा जाता है, वह शायद ही कभी ठग का अपना होता है। वह म्यूल खाता होता है, अक्सर किसी असली व्यक्ति के दस्तावेजों से खोला गया, कई बार ऐसे व्यक्ति का जिसे कुछ हजार रुपये देकर खाता इस्तेमाल किया गया। मिनटों में रकम बंटकर तीन-चार और खातों में चली जाती है।
जब तक शिकायत अगले दिन लाभार्थी बैंक तक पहुंचती है, रास्ता इतना बंट चुका होता है कि एक लियन से कुछ नहीं होता। इसीलिए हेल्पलाइन एक फॉर्म नहीं, एक फोन नंबर है।
1930 असल में करता क्या है
1930 पर कॉल करने से नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग प्रणाली पर टिकट बनता है, जो भेजने वाले और पाने वाले दोनों बैंकों को अलर्ट भेजता है। अगर पैसा अभी आगे नहीं गया है तो पाने वाला बैंक उसे रोक सकता है।
यह रिफंड नहीं, रोक है। पैसा वापस मिलना उसके बाद बैंक की विवाद प्रक्रिया और विवादित मामलों में अदालत से होकर आता है। पर जो रुका ही नहीं, वह लौट भी नहीं सकता।
तीन चीजें तैयार रखें
अपना खाता नंबर और ट्रांजैक्शन संदर्भ, दिख रहा हो तो लाभार्थी की UPI आईडी या खाता नंबर, और पैसे कटने का सही समय। पहली कॉल के लिए इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।
लोग कॉल करने से पहले स्क्रीनशॉट ढूंढने में समय गंवा देते हैं। पहले जो पता है उसी के साथ कॉल करें, सबूत बाद में लिखित शिकायत के लिए जुटाएं।
कॉल के बाद
उसी दिन cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें और पावती संख्या रखें। वह संख्या बैंक को फोन पर नहीं, लिखित में दें और बदले में लिखित विवाद संदर्भ मांगें।
फिर हर हफ्ते फॉलो-अप करें। वही शिकायतें आगे बढ़ती हैं जिनमें शिकायतकर्ता हर कॉल का तारीखवार रिकॉर्ड रखता है और शाखा के चुप होने पर नोडल अधिकारी तक जाता है।